
ये बड़ा-सा टाइटल तो दे दिया, लेकिन सच मेरे पास कहने को कुछ नहीं।
मुझे नहीं आता गड़े मुर्दे उखाड़ना, बारह साल पहले हुए किसी हत्या का पोस्टमार्टम करना। फिर उसके गुनाहगार की मनःस्थिति पर विचार करना। सही-गलत के तराजू पर रखकर कानून की धज्जियाँ उड़ाना। मुझे नहीं आता अपने देश में किसी महिला के साथ हुए बलात्कार पर बार-बार टिप्पणी करना। पहले से ही सहमी हुई उस औरत की आत्मा का बार-बार बलात्कार करना।
मुझे क्यों नहीं आता सेंसेक्स के उतार-चढ़ाव बहस करना? मुझे तो ऑफिस की कॉफी-मशीन के पास खड़े होकर घर की नोंक-झोंक पर मुँह बनाते भी नहीं आता। मैं देश की दुर्गति की क्या बात करूँ?
मुझे तो सिर्फ इतना पता है कल गणतंत्र दिवस है। बचपन में टीवी के सामने बैठकर परेड और झाँकियाँ देखने में बड़ा मज़ा आता था। अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग परम्पराएँ, उनका नृत्य, उनकी वेशभूषा। खुले आसमान में एयर फोर्स के विमान जब तिरंगा झण्डा लहराते थे, तो वो सब देखकर ही मन खुशी से नाच उठता था। तब सोचती थी बड़े होकर अपने देश के सारे शहर देखूँगी, उनकी अलग-अलग संस्कृतियों के बारे में जानूँगी।
जब भारत का ज़िक्र होता है, तो सबसे पहले स्वतंत्रता संग्राम, अंग्रेजो की गुलामी, गुजरात के दंगे, नेताओ की जालसाजी, गरीबी, भ्रष्टाचार यही सब क्यों?
जो हो गया उसे हम भूल क्यों नहीं पाते? हाँ उन स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को कोई नहीं भूल सकता। लेकिन हम अपना कॅरियर बनाने के लिए जब अपने माँ-बाप को भूलाकर अमेरिका, लंडन जा सकते हैं, तो फिर कम से कम उन दुर्घटनाओं को तो भूलाया ही जा सकता है, जो नहीं होना चाहिए थी। ताकि अब भारत को समृद्ध बनाने के लिए आगे क्या करना है उन योजनाओं पर तो विचार कर सके।
मैं एक छोटे-से घर में छोटे-से परिवार के बीच घर की छोटी-छोटी उलझनों से घिरकर अपने व्यक्तित्व को बहुत छोटा कर लेती हूँ, फिर उस छोटे-से टीवी के सामने बैठकर अपने छोटे-छोटे बच्चों के हाथ में देश का झंडा पकड़ाकर उन्हें दिखाती हूँ वही परेड, वही झाँकियाँ, जो मैं अपने बचपन में देखा करती थी। घर के पास की छोटी-सी गली में एक छोटे बच्चे को देखती हूँ जो 1-1 रुपए में झँडे बेचता है और शाम को उन्हीं पैसों से गली के सारे बच्चों को मौज मनाते हुए देखती हूँ। मुझे दिखाई नहीं देती उनकी गरीबी, उनकी लाचारी, मुझे तो उनके चेहरे पर आई अपनी कमाई की गौरांवित मुस्कान दिखाई देती है और दिखाई देता है अपने बच्चों की आँखों में वही सपना कि बड़े होकर हम अपने देश के सारे शहर देखेंगे, उनकी संस्कृति के बारे में जानेंगे। 
मेरा या मेरे बच्चों का यह सपना शायद बहुत छोटा है, लेकिन जब छोटे-छोटे सपनें पूरे हो जाते हैं तो बड़ा सपना देखने की हिम्मत आ जाती है।

लोड हो रहा है...
प्रतिक्रियाएँ