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मैं बँट जाती हूँ




चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी




मुझे तलाश है एक ऐसे जहाँ की
जहाँ मुझे अभिनय न करना पड़े
रिश्तों के चरित्र में ढलकर,
जहाँ मुझे बँटना न पड़े
जैसे बँट जाते है
कमरे एक ही घर के
मैं जिस कमरे में जाती हूँ
उस कमरे-सी हो जाती हूँ,

थोड़ा बँट जाती हूँ
सुबह की चाय के साथ चुस्कियों में,
दोपहर के खाने में
ऑफिस के टिफिन के डिब्बे की तरह
जहाँ एक में सिर्फ रोटी होती है
एक में सिर्फ सब्जी...

मैं बँट जाती हूँ
शाम को घर लौटते समय
अगले दिन की तैयारी
और बच्चों के होमवर्क में

रात को बँटती नहीं बदल जाती हूँ
हक़ीकत के बिस्तर पर
कल्पनाओं को सुलाकर
अजीब से ख़्वाब बुनती हूँ
और अगले दिन हो जाती हूँ कवि
और बाँट देती हूँ अपने ख़्वाबों को
आधा कविता में, आधा कहानियों में

अपनी रूह के हर कतरे में
टपकती रहती हूँ
दिन की फटी छत से
रात के बर्तन में

अपनी मुफलिसी को छिपाना नहीं आता
और ना ही आता है पुते चेहरों के साथ
फैमिली रेस्टॉरेंट में बच्चों को पिज्जा खिलाना

मुझे आता है बस अभिनय करना
रिश्तों के चरित्र में ढलकर
बँट जाना घर के कमरों की तरह
जिस कमरे में जाओ
उस कमरे-सा हो जाना..........

प्रतिक्रियाएँ

Re: मैं बँट जाती हूँ
गुम हो चले हो तुम तो बहुत ख़ुद में ए मुनीर दुनिया को कुछ तो अपना पता देना चाहिए आदत सी बना ली है तुमने तो मुनीर अपनी जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना
Re: मैं बँट जाती हूँ
तुम्हारी संवेदना हृदय तक पहुँच रही है। दरअसल हम बंटते रहते हैं- जीवनभर। हमेशा ही यह बंटवारा प्रेम की एवज में होता है। अंत में जब कुछ भी नहीं होते हैं हम। तब सबकुछ होने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह एक यात्रा है। जिसमें अभिनय और यथार्थ के बीच की दूरी जितनी घटती जाती है। जीवन उतना ही सुन्दर होता है। बधाई।
Re: मैं बँट जाती हूँ
ये कविता सिर्फ आपकी ही कहानी नहीं, ये तकरीबन सब ही का हाल हैं| | दिन भर एक भीड़ से दूसरी भीड़ की तरफ दौड़ते हुए बस ऐसा लगता हैं जैसे दिनभर सिर्फ अपना चेहरा बदलना ही जिंदगी हैं|
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