
तलब जिस्मानी नहीं,
रूह से एक कसक उठी
और दौड पडी हैं रग़ो में तडप बनकर
मैंने अपनी तडप का चाँद बेचकर
तेरे इश्क का आसमां खरीद लिया
सोचकर कि तू जब भी बरसेगा
मेरी तलब के लबों को
दो बूँद नसीब होगी
या रब ! ये कैसा इम्तिहां है
कि जिस्म बाग़ी नहीं
मगर रूह तडप कर रह जाती है.............

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