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तलब जिस्मानी नहीं




चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


तलब जिस्मानी नहीं,
रूह से एक कसक उठी
और दौड पडी हैं रग़ो में तडप बनकर
मैंने अपनी तडप का चाँद बेचकर
तेरे इश्क का आसमां खरीद लिया
सोचकर कि तू जब भी बरसेगा
मेरी तलब के लबों को
दो बूँद नसीब होगी
या रब ! ये कैसा इम्तिहां है
कि जिस्म बाग़ी नहीं
मगर रूह तडप कर रह जाती है.............



प्रतिक्रियाएँ

Re: तलब जिस्मानी नहीं
बेहद खूबसूरत कम शब्दों में कमाल किया है। लगता है लेखक ने अपनी आत्मा को सलाम किया है...
Re: तलब जिस्मानी नहीं
बेहद खुबसुरत ... कमाल किया है ...लिखने वाले और हम सब तक पहुचाने वाले दोनो ने... कमाल और शुक्रिया...
Re: तलब जिस्मानी नहीं
हम उस लिखने वाले को सलाम करते हैं .. आप ने अपनी आत्मा का सारा भार मेरे कंधों पर डाल दिया है... धन्यबाद
Re: तलब जिस्मानी नहीं
सुंदर रचना।
अस्वीकरण