
बहुत दिन हुए
उम्र की दराज़ से एक पुराना-सा खत निकाला
लगा कि दर्द की आँखों का दरिया सूख चुका है
वक्त की धूल काफी जम चुकी थी
जब साफ करने लगी
तो यादों की मिट्टी हाथों में लग गई
किसी चुनरिया से पोंछने की हिम्मत ना कर सकी
शायद दाग़ छुपाने का जज़्बा जाता रहा है
हाथ धोने आँगन तक गई तो लगा
किसी ने अतित के दरवाज़े पर होले से दस्तक दी
घबराई-सी कुछ देर खड़ी रही
दोबारा दस्तक के इंतज़ार में....
बहुत दिन हुए ......
शायद कई साल,
सदियाँ बीत गई हैं
आज भी खडी हूँ
उसी दरवाज़े पर
दोबारा दस्तक के इंतज़ार में.....

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