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एक रिश्ता



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



उसके हाथ में उठ आए फफोलों से रिसते पानी का मेरी आँखों से बहते आँसुओं से कोई मुकाबला नहीं था। शायद इसीलिए तीन दिन से बहती मेरी आँखें एकदम से सूख गई थी। तीन दिन से जीवन की ऊहापोह में फँसे शब्द उसको देखकर गले में अटक-से गए थे। उसे कुछ कहना रिश्ते को छोटा करने जैसा था। फिर भी उसे दिनभर डाँटती रही उसकी इस हरकत के लिए। उससे मेरा दर्द नहीं देखा गया था, इसलिए उसने अपना हाथ जलती मोमबत्ती के उपर रख लिया था, जैसे कोई शपथ ले रही हो कि जीवन की सारी खुशियाँ मेरे कदमों पर लाकर रख देगी।

मैं उसे ठीक से गले भी नहीं लगा पा रही थी। मुझे अपना दुख बहुत छोटा लगने लगा था और उसका प्रेम उससे भी बड़ा हो गया था। मैं जो खुद से ही बाहर नहीं निकल पा रही थी, उसने मेरे ह्रदय से सतही दुखो को हटाकर कहीं गहरे में अपने प्रेम का अखंड दीप जला दिया था।

उसके बारे में कुछ भी लिखना मेरे लिए किसी प्रसव पीड़ा से गुजरने के बाद एक नए जीवन को जन्म देने के समान होता है।

मेरा एक दोस्त अकसर मुझसे कहता था, क्यों तुम भागती हो किसी की तलाश में, तुम जिसे तलाश रही हो वह कहीं बाहर नहीं, तुम्हारे अंदर ही है, बस ज़रूरत है तो उसे पहचानने की। वह सुगंध तो खुद ही तुम्हारे दरवाजे पर रोज आकर दस्तक दे जाती है, लेकिन तुम भगवान के आगे अगरबत्ती लगाकर अपनी तलाश के खत्म होने की प्रार्थना करती रहती हो।

फिर भी एक दिन मैंने अपने मन के असीमित मैदान से निकलकर इस ब्रह्माण्ड के छोटे से कमरे में झाँककर देखा...तो वह दिखाई दी। उसके मिलने के बाद ऐसा बहुत कुछ मिला, जो मेरे मन की बंजर ज़मीं पर कभी नहीं उगा था।

उम्र से परे भी ऐसे कई रिश्ते होते हैं, जिनका कोई नाम नहीं होता। माँ के प्रेम से वंचित उसे मेरी गोद में ममता मिल गई। और मुझे उम्र के जंगलों में कई बरस भटकने के बाद एक दोस्त। मेरी उदासी मेरे चेहरे पर कम उसके चेहरे पर ज्यादा दिखाई देती है। एक दिन कहने लगी अपने सारे दर्द मुझे दे दो। मैंने कहा जीवन में ऐसा कोई दर्द या ग़म नहीं जो मैं संभाल न सकूँ। हो सके तो बस मेरा प्यार संभाल लेना जो आज तक कोई नहीं संभाल सका.............


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