

जिस चीज पर पूरी दुनिया की नज़र हो, वह हम कलम के कारीगरों से वंचित रह जाए? हो ही नहीं सकता। 10 जनवरी 2008, गुरूवार, टाटा, नैनो और मैं। ऐसा लग रहा था जैसे टाटा ने यह गाड़ी सिर्फ मेरे लिए लाँच की है। यह मैं सिर्फ मैं नहीं हूँ, यह मैं हमारे पड़ोस के वर्माजी है, जो बैंक में कर्मचारी है। जिन्होंने जब पहली बार लूना बेचकर स्कूटर खरीदी थी तब भी उतने ही खुश थे, जितने उस दिन हुए थे जब स्कूटर बेचकर बाइक खरीदी। आज मैंने उन्हें उतना ही खुश देखा है, जैसे अब वे अपनी बाइक बेचकर लखटकिया खरीदने वाले हो। 
यही नहीं एक गली छोड़कर श्रीवास्तवजी रहते हैं, लंच के लिए घर आते हैं, उनके घर के पास में एक पान की दुकान है। टीवी पर न्यूज़ आ रही थी रतन टाटा खुद अपनी छोटी-सी माचिस की डिबिया में बैठकर आ रहे हैं। सच में मुझे वो माचिस की डिबिया जैसी ही लगी जिसने एक आम आदमी के दिल में सपनों की ऐसी चिंगारी जलाई है कि हर मध्यमवर्गीय व्यक्ति खुद को सिर्फ वह कार देखकर उच्च मध्यमवर्गीय समाज का हिस्सा मान बैठा है। श्रीवास्तवजी को मैंने वहीं पान की दुकान पर चल रहे टीवी के सामने मुँह फाड़े खड़ा देखा जैसे स्वयं इन्द्र भगवान अपने रथ पर सवार होकर आए हो और उनके सामने खड़े हो गए हो, बोलो वत्स क्या वरदान चाहिए? और श्रीवास्तवजी की नज़र इंद्र के रथ पर ही टीक गई हो।
हर किसी की ज़ुबाँ पर एक ही बात थी टाटा की लखटकिया, एक आम आदमी की कार। सच में 10,000 प्रतिमाह कमाने वाले एक आम आदमी के पास अपना घर, एक अच्छी बीवी, दो प्यारे-प्यारे बच्चे और एक कार हो तो मानो उसका संपूर्ण गृहस्थी का सपना पूरा हो गया। फिर और क्या चाहिए? घूमेंगे, फिरेंगे, नाचेंगे गाएँगे, एश करेंगे...और क्या?

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