
घर की दहलीज को पार कर
आँगन में धूप सेंकते-से,
कभी मोहल्ले के शोर में
पड़ोसी के साथ फुसफुसाते हुए
कभी समाज की संकुचित विचारधारा,
कभी मॉडर्न सॉसाइटी को कोंसते-से
कभी मन की उलझनों में फँसे
तो कभी परमात्मा को खोजते-से
कभी जीवन में मदहोश
कभी मृत्यु पर रोते-से
कभी खुद पर इठलाते हुए
कभी ईर्ष्या में जलते हुए
कभी प्रेम में बहते हुए
कभी भक्ति में रमे हुए
मुझे मेरे विचार दिखाई देते हैं
यूँही हर जगह भीड़ बनाकर घूमते-से
जब भी बढ़ती हूँ उस भीड़ को चीरते हुए
मिल जाता है एक एकांत
कहीं कोने में दुबका
मेरा इंतज़ार करता हुआ........................

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