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9 जनवरी, 2008


ब्लॉग्स (1)
घर की दहलीज को पार कर आँगन में धूप सेंकते-से,कभी मोहल्ले के शोर में पड़ोसी के साथ फुसफुसाते हुएकभी समाज की संकुचित विचारधारा, कभी मॉडर्न सॉसाइटी को कोंसते-से कभी मन की उलझनों में फँसे तो कभी परमात्मा को खोजते-से कभी जीवन में मदहोश कभी मृत्यु पर रोते-से कभी ... आगे पढ़ें...