
हमारे ऑफिस में कॉफी मशीन लगी है। जिसे पीना हो खुद लेकर पी लेता है। ऑफिस बॉय की जिम्मेदारी केवल पानी देने की है। और सही भी है 100 लोगों के स्टाफ में हर कोई 3 से 4 बार चाय-कॉफी पीता है। यदि ऑफिस बॉय सबको लाकर दे, तो बेचारा दिनभर लोगों को चाय पिलाने के अलावा कुछ नहीं कर सकेगा।
एक दिन काम की व्यस्तता के कारण मैंने उसे ही कह दिया चाय लाने को। काफी देर तक चाय नहीं आई, तो मैंने दोबारा से पूछा। उसने तुरंत जवाब दिया “मेडम सेल्फ सर्विस है, खुद ही ले लिजिए।“ उस समय थोड़ा गुस्सा जरूर आया, लेकिन फिर सोचा, कितनी हिम्मत जुटाई होगी उसने ना कहने के लिए। और जब कह दिया उसके बाद जो विजय की मुस्कान चेहरे पर आई होगी उसने उसके व्यक्तित्व में कितना आत्मविश्वास भर दिया होगा।
यह बात मैंने अपने एक सहकर्मी को बताई, तो वह हँसने लगा। पूछने लगा क्या उस समय बुरा नहीं लगा? मैंने कहा, लगा ना मेरी जगह कोई भी होता तो लगता, सो मुझे भी लगा और अपना गुस्सा निकालने के लिए मैं मशीन से दो चाय लेकर आई। एक खुद के लिए और एक ऑफिस बॉय के लिए।
कुछ दिनों बाद बॉस ने मेरे सहकर्मी को केबिन में बुलाकर कुछ व्यक्तिगत काम दे दिया। उसे पता नहीं क्यों ऑफिस बॉय वाली घटना याद रह गई और बॉस को मना कर दिया, यह कहकर कि यह मेरा काम नहीं। ज्यादा कुछ नहीं हुआ बॉस ने वह काम किसी और कर्मचारी से करवा लिया। फिर अप्रैजल के समय उस कर्मचारी की तंख्वाह ज्यादा बढ़ाई गई, जिसने बॉस का काम किया था।
जब यह घटना उसने मुझे सुनाई, तो लगा कितना फर्क था ऑफिस बॉय के ना कहने में और सहकर्मी के ना कहने में। कई बार ऐसे मौके आते हैं, जब हम तय नहीं कर पाते कि ना कहे या हाँ, ना कहना भी हो तो कैसे कहे? उसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे?
ऑफिस बॉय ने जब मुझे चाय के लिए ना कहा तो उसका परिणाम यह निकला कि मैंने दोबारा कभी उसे चाय लाने के लिए नहीं कहा, लेकिन सहकर्मी के एक बार ना कह देने के बाद बॉस ने व्यक्तिगत तो दूर, कोई नया प्रोजेक्ट भी सहकर्मी को नहीं दिया।

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