अपने भीतर की सर्द रातों में
अकसर तन्हाई का लिहाफ ओढ़ लेती हूँ
जुनून की राह से गुजरती यादों को
हाथ बढा कर रोक लेती हूँ
सुनाती हूँ किस्से उन चंद लम्हों के
जो उम्र से जुड़कर जीवन हो गए
फिर उसी जीवन से कुछ हादसे चुराकर
नई कहानी जोड़ लेती हूँ
घूमकर आती हूँ रात के आखरी कोने तक
सपनों की गली से गुजरते हुए
जब थक जाती हूँ
सुबह की बाँहों में लेट लेती हूँ

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