श्रेणियाँ: बातें कुछ अनकही सी
554 views. 4.66 rating from 48 votes.
जनवरी 2008
ये बड़ा-सा टाइटल तो दे दिया, लेकिन सच मेरे पास कहने को कुछ नहीं। मुझे नहीं आता गड़े मुर्दे उखाड़ना, बारह साल पहले हुए किसी हत्या का पोस्टमार्टम करना। फिर उसके गुनाहगार की मनःस्थिति पर विचार करना। सही-गलत के तराजू पर रखकर कानून की धज्जियाँ उड़ाना। मुझे नहीं ... और पढ़ें...
मुझे तलाश है एक ऐसे जहाँ की जहाँ मुझे अभिनय न करना पड़े रिश्तों के चरित्र में ढलकर, जहाँ मुझे बँटना न पड़े जैसे बँट जाते है कमरे एक ही घर के मैं जिस कमरे में जाती हूँ उस कमरे-सी हो जाती हूँ, थोड़ा बँट जाती हूँ सुबह की चाय के साथ चुस्कियों में, दोपहर के खाने ... और पढ़ें...
तलब जिस्मानी नहीं, रूह से एक कसक उठी और दौड पडी हैं रग़ो में तडप बनकर मैंने अपनी तडप का चाँद बेचकर तेरे इश्क का आसमां खरीद लिया सोचकर कि तू जब भी बरसेगामेरी तलब के लबों को दो बूँद नसीब होगी या रब ! ये कैसा इम्तिहां है कि जिस्म बाग़ी नहीं मगर रूह तडप कर रह ... और पढ़ें...
बहुत दिन हुए उम्र की दराज़ से एक पुराना-सा खत निकालालगा कि दर्द की आँखों का दरिया सूख चुका है वक्त की धूल काफी जम चुकी थी जब साफ करने लगी तो यादों की मिट्टी हाथों में लग गई किसी चुनरिया से पोंछने की हिम्मत ना कर सकी शायद दाग़ छुपाने का जज़्बा जाता रहा है हाथ ... और पढ़ें...
उसके हाथ में उठ आए फफोलों से रिसते पानी का मेरी आँखों से बहते आँसुओं से कोई मुकाबला नहीं था। शायद इसीलिए तीन दिन से बहती मेरी आँखें एकदम से सूख गई थी। तीन दिन से जीवन की ऊहापोह में फँसे शब्द उसको देखकर गले में अटक-से गए थे। उसे कुछ कहना रिश्ते को छोटा ... और पढ़ें...
जिस चीज पर पूरी दुनिया की नज़र हो, वह हम कलम के कारीगरों से वंचित रह जाए? हो ही नहीं सकता। 10 जनवरी 2008, गुरूवार, टाटा, नैनो और मैं। ऐसा लग रहा था जैसे टाटा ने यह गाड़ी सिर्फ मेरे लिए लाँच की है। यह मैं सिर्फ मैं नहीं हूँ, यह मैं हमारे पड़ोस के वर्माजी है, ... और पढ़ें...