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जनवरी 2008

 

• चाँद का अचार

एक रात तन्हाई संग छत पर टहलने निकलीतो देखा आसमान के आँगन में चाँद का अचार रखा था माँ उसे उठाना भूल गई थीतो तारे उस पर लग गए थेमैं उसे उठाकर ले आईआँसुओं से धोया और सपने के छज्जे पर रख दिया जब कभी दोपहर बेस्वाद हो जाती थी चाँद का अचार चख लेती थी कभी कविता ...   और पढ़ें...
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• मैं एक रूह

मैं एक रूह देह के लिबास में जीवन के शो रूम में सजाया हुआजिसका लिबास जितना सुंदर उतनी ज्यादा उसकी कीमत जो जितना आम फैशन से अलग उतना यूनिक मैं एक लिबास रूह को पहनाया हुआ जो जितने कम लिबास में उतना ज्यादा कॉंट्रोवर्शियल लिबास जितना पारदर्शी आत्मा उतनी ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: अधूरी कहानियाँ
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• सुनों गौर से दुनिया वालो.......

ये बड़ा-सा टाइटल तो दे दिया, लेकिन सच मेरे पास कहने को कुछ नहीं। मुझे नहीं आता गड़े मुर्दे उखाड़ना, बारह साल पहले हुए किसी हत्या का पोस्टमार्टम करना। फिर उसके गुनाहगार की मनःस्थिति पर विचार करना। सही-गलत के तराजू पर रखकर कानून की धज्जियाँ उड़ाना। मुझे नहीं ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरा कोना
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• मैं बँट जाती हूँ

मुझे तलाश है एक ऐसे जहाँ की जहाँ मुझे अभिनय न करना पड़े रिश्तों के चरित्र में ढलकर, जहाँ मुझे बँटना न पड़े जैसे बँट जाते है कमरे एक ही घर के मैं जिस कमरे में जाती हूँ उस कमरे-सी हो जाती हूँ, थोड़ा बँट जाती हूँ सुबह की चाय के साथ चुस्कियों में, दोपहर के खाने ...   और पढ़ें...
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• तलब जिस्मानी नहीं

तलब जिस्मानी नहीं, रूह से एक कसक उठी और दौड पडी हैं रग़ो में तडप बनकर मैंने अपनी तडप का चाँद बेचकर तेरे इश्क का आसमां खरीद लिया सोचकर कि तू जब भी बरसेगामेरी तलब के लबों को दो बूँद नसीब होगी या रब ! ये कैसा इम्तिहां है कि जिस्म बाग़ी नहीं मगर रूह तडप कर रह ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• इंतज़ार में.....

बहुत दिन हुए उम्र की दराज़ से एक पुराना-सा खत निकालालगा कि दर्द की आँखों का दरिया सूख चुका है वक्त की धूल काफी जम चुकी थी जब साफ करने लगी तो यादों की मिट्टी हाथों में लग गई किसी चुनरिया से पोंछने की हिम्मत ना कर सकी शायद दाग़ छुपाने का जज़्बा जाता रहा है हाथ ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• एक रिश्ता

उसके हाथ में उठ आए फफोलों से रिसते पानी का मेरी आँखों से बहते आँसुओं से कोई मुकाबला नहीं था। शायद इसीलिए तीन दिन से बहती मेरी आँखें एकदम से सूख गई थी। तीन दिन से जीवन की ऊहापोह में फँसे शब्द उसको देखकर गले में अटक-से गए थे। उसे कुछ कहना रिश्ते को छोटा ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: अधूरी कहानियाँ
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• परिवार ओशो की नज़र से

परिवार जैसा आज तक रहा है, उस परिवार को ठीक से समझने के लिए यह ध्यान में रख लेना जरूरी है कि परिवार का जन्म प्रेम से नहीं, बल्कि प्रेम को रोक कर हुआ है। इसीलिए सारे पुराने समाज प्रेम के पहले ही विवाह पर जोर देते रहे हैं। सारे पुराने समाजों का आग्रह रहा है ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: अमृता और ओशो
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• टाटा, नैनो और मैं

जिस चीज पर पूरी दुनिया की नज़र हो, वह हम कलम के कारीगरों से वंचित रह जाए? हो ही नहीं सकता। 10 जनवरी 2008, गुरूवार, टाटा, नैनो और मैं। ऐसा लग रहा था जैसे टाटा ने यह गाड़ी सिर्फ मेरे लिए लाँच की है। यह मैं सिर्फ मैं नहीं हूँ, यह मैं हमारे पड़ोस के वर्माजी है, ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरा कोना
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• विचारों की भीड़

घर की दहलीज को पार कर आँगन में धूप सेंकते-से,कभी मोहल्ले के शोर में पड़ोसी के साथ फुसफुसाते हुएकभी समाज की संकुचित विचारधारा, कभी मॉडर्न सॉसाइटी को कोंसते-से कभी मन की उलझनों में फँसे तो कभी परमात्मा को खोजते-से कभी जीवन में मदहोश कभी मृत्यु पर रोते-से कभी ...   और पढ़ें...
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• किसे कहे ‘ना’? -ज्ञानगुरू से प्रेरित

हमारे ऑफिस में कॉफी मशीन लगी है। जिसे पीना हो खुद लेकर पी लेता है। ऑफिस बॉय की जिम्मेदारी केवल पानी देने की है। और सही भी है 100 लोगों के स्टाफ में हर कोई 3 से 4 बार चाय-कॉफी पीता है। यदि ऑफिस बॉय सबको लाकर दे, तो बेचारा दिनभर लोगों को चाय पिलाने के अलावा ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरा कोना
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• एक रात का किस्सा

अपने भीतर की सर्द रातों में अकसर तन्हाई का लिहाफ ओढ़ लेती हूँ जुनून की राह से गुजरती यादों को हाथ बढा कर रोक लेती हूँ सुनाती हूँ किस्से उन चंद लम्हों के जो उम्र से जुड़कर जीवन हो गए फिर उसी जीवन से कुछ हादसे चुराकर नई कहानी जोड़ लेती हूँ घूमकर आती ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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