
भावनाएँ जब शब्दों में ढल जाती हैं तो मुकम्मल हो जाती है।
यह कुछ शब्द यकायक ही ज़ुबां पर आ गए जब किसी ने मुझसे कहा कि जो दिल में है उसे कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं, आप ही कह दो।
बहुत मुश्किल होता है अवर्णित प्रेम को वर्णित करना और वो भी उस व्यक्ति की भावनाओं के ढाँचे में, लेकिन जब कोई आप पर इतना विश्वास रखकर इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपता है, तो आप अपने स्तर से उठ जाते है, क्योंकि आपको खुद से परे होकर सामने वाले के भाव को खुद में आत्मसात करना होता है।
“उसने मुझसे कहा मैं ऐसा कुछ कहूँ जो सुकून दे जाए”
उसकी आँखों में मैंने प्रेम की चरम सीमा को छूने की कोशिश देखी है, उसकी बातों से लगा उसके प्रेम और पूजा के बीच बहुत ही महीन-सा धागा है। परंतु उसे यह एहसास दिलाना भी मेरे लिए आवश्यक हो गया था कि जो प्रेम उसे अनुभव हो रहा है, वो उसके अंदर की ही चेतना है, जो बरसों से अलग-अलग रास्तों पर निकलकर बिखर गई थी। और आज उसने किसी एक को केन्द्र बनाकर उन बिखरी हुई चेतनाओं को समेटकर एक मुकम्मल भावना को जन्म दिया है, जैसे कई नदियाँ अलग-अलग रास्तों से आकर एक विशाल समन्दर में खुद को समर्पित कर देती हैं, फिर नदी का अपना कोई स्वरूप नहीं होता, कुछ होता है तो वो है भव्य समन्दर जिसमें हर नदी को अपना अस्तित्व सिर्फ उस समन्दर के रूप में दिखाई देता है।
मैंने कहा- “तुम प्रेम को अपनी आँखों में लिए उसे उस व्यक्ति में ढूँढती हो जिससे तुम्हें प्रेम है। और तुम्हें लगता है तुम्हें उसकी आँखों में वह प्रेम मिल गया। किसी मृग को कस्तूरी मिल जाए, तो वह मृगतृष्णा नहीं रहती, उसे कहते है खुद को पा लेना.............और तुमने खुदको पा लिया है, इससे बड़ा सुकून दुनिया में कोई नहीं।

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