
जो व्यक्ति रंगमंच से जुड़ा होता है, वह कहीं न कहीं समाज की मुख्यधारा से कटा हुआ रहता है। अपने जीवन के अधूरेपन की कुंठा को रंगकर्म से जोड़कर पूर्णता के रस को घूँट घूँट पी रहा होता है। रंगकर्म के उस मंच पर उसके अपाहिज सपने बैसाखी लिए चढ़ते है, फिर मानो वहाँ चढ़ने के बाद उसे पर लग जाते है। कल्पना और कला के विशाल आकाश में वह स्वच्छंद पंछी की तरह उड़ने लगता है।
यह बात हर रंगकर्मी पर लागू हो यह आवश्यक नहीं, लेकिन उन लोगों पर अवश्य लागू होती है, जो रंगमंच पर नव रस को अमृत की तरह पी रहा होता है और अपने जीवन के कम से कम कुछ अनमोल पलों के तृप्त होने के सुख को अनुभव कर रहा होता है। 
ऐसा ही कुछ मुझे अनुभव हुआ जब मैंने “असमंजस बाबू” को देखा। जब हजारों की भीड़ में कोई एक अलग-सा दिखाई दे, तो वह या तो महात्मा होता है या कोई पागल। जब अपनी अलग-सी सोच के कारण वह महान नहीं बन पाता तो अपने अकेलेपन की और अलग-सा होने की कुंठा उसे धीरे-धीरे पागल कर देती है और उसे लोग कहने लगते है...असंजस बाबू, जो समाज के बनाए हुए किसी भी ढाँचे में फिट नहीं बैठता, जो अपनी बनाई हुई दुनिया में जीता है, उसकी दुनिया में कोई नियम कानून नहीं, कोई हिंदू मुस्लिम नहीं, कोई इंसान या जानवर नहीं....उसकी दुनिया में उन सभी के लिए प्रेम है जिसमें जीवन लहू बनकर बहता है, जो स्वच्छंद साँस ले सकता है, जो एक जीव का दूसरे जीव के प्रति प्रेम प्रकट कर सकता हो....फिर चाहे वो एक कुत्ता ही क्यों न हो।
सत्यजीत रे के बंगाली नाटक “असमंजस बाबू का कुत्ता” का हिंदी रूपांतरण,,,”असंजस बाबू”, राकेश यादव का अभिनय, भौमिकजी का निर्देशन, संवाद और उनका प्रस्तुतिकरण सच में कोई एक भी ऐसा नहीं था जो उन्नीसा हो .............
हॉल में कुर्सियाँ नहीं थी, कुछ वरिष्ठ लोगों के अलावा सभी नीचे बैठकर यह नाटक देख रहे थे, मैं कभी मंच की ओर देख रही थी तो कभी फर्श पर बीछीं दरियों पर बैठे लोगों को..........................सच में मुझे कुछ लोग ऐसे दिखाई दिए जिन्हें आज भी जमीन से जुड़ा हुआ कह सकती हूँ।

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