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24 दिसंबर, 2007


ब्लॉग्स (1)
जो व्यक्ति रंगमंच से जुड़ा होता है, वह कहीं न कहीं समाज की मुख्यधारा से कटा हुआ रहता है। अपने जीवन के अधूरेपन की कुंठा को रंगकर्म से जोड़कर पूर्णता के रस को घूँट घूँट पी रहा होता है। रंगकर्म के उस मंच पर उसके अपाहिज सपने बैसाखी लिए चढ़ते है, फिर मानो वहाँ ... आगे पढ़ें...