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Only For Ladies…..


जिसके नयनों की नदी में बह जाता हो हर दुख, आँचल की नम भूमि पर फूट आती हों, नन्हीं कोंपलें नए जीवन का संदेश देती हुई, जिसकी बाँहों का आकाश सदा खुला रहता हो अरमानों के पंछियों के लिए, उस नारी की जब भी बात आती है, मैं गौरांवित हो जाती हूँ यह सोचकर कि मैं एक नारी हूँ......फिर चाहे बात जीवन की निरंतता की हो, चंचलता की हो या सुंदरता की............

आपने कभी गौर किया है कि जब भी सौंदर्य जैसे शब्द आते हैं, तो नारी के देह को नज़र अंदाज नहीं कर पाता कोई, फिर चाहे अजंता एलोरा की मूरत हो, फिर चाहे गुलज़ार का गीत (तेरे कमर के बल से नदी मुड़ा करती थी, हँसे तो गालों पर भँवर पड़ा करते थे, और वो.....ज़ुल्फों के नीचे गर्दन पर सुबह शाम मिलती रहे)....... यह सब एक पुरुष ही लिख सकता है, नारी नहीं कर सकती सौंदर्य की रचना शब्दों में....क्योंकि वह खुद आत्मसात करती है सुंदरता को स्वयं में..... डोंट माइंड, जब भी कोई नारी सजती-सँवरती है, तो खुद को किसी कवि की कल्पना से कम नहीं समझती, उसका अपना एक स्टाइल होता है.........

हाँ तो मेरा पसंदीदा परिधान...जी हाँ साड़ी, रंग?? जो मुझे खुश कर जाए और दूसरों को आकर्षित। प्लेन साड़ियाँ, ह्म्म्म्म्म्म्म, आइ एम लविंग इट...फिर भी फ्लोरल प्रिंट्स यानि खुशनुमा सुबह की शुरुआत, बड़ी बिंदी....मेरी पहचान( मुझे कई लोग सिर्फ मेरी बिंदी की वजह से जानते है)...हमेशा रॉयल फील होता है....थोड़ा-सी परिपक्वता आ जाती है चेहरे पर, हाँ तब नज़रें चुरा लेती हूँ... यु नो आँखों की किलकारियाँ बाज नहीं आती।
लेकिन पता नहीं क्यों आजकल बालों से झाँकते उम्र के ताने बुरे नहीं लगते, इसलिए छुपाती नहीं, अकसर बाल खुले रखती हूँ, हर साल हेअर स्टाइल बदलवाती हूँ, बड़ी ज्वेलरी, बिड्स और स्टोन हो तो सोने पर सुहागा।

बहुत हो गया खुद के बारे में, अब आइए थोड़ा जनरलाइज़ कर देते हैं स्टाइल को। पसंदीदा परिधान ....महिलाओं के लिए साड़ी, लड़कियाँ....10 में से 9 लड़की आपको सिर्फ जींस और टॉप में नज़र आएँगी। यु नो मोर कम्फर्टेबल..... कौन दुपटा संभालता फिरे?? आजकल कान में लम्बी बालियों का फैशन है, और हाँ, लाँग स्कर्ट को कैसे भूल सकते हैं। उसे देखकर कम से कम युवाओं में आज भी ट्रेडिशनल टच के जीवंत होने की संतुष्टि रहती है।

हमारे इन्दौर में कपड़ों के लिए बहुत बड़ा बाजार है, जहाँ देखो वहाँ इंद्रधनुषी रंगो की छटा बिखरी हुई नज़र आती है। चूडियों का बाजार, जहाँ त्योहारों पर तो पैर रखने की जगह नहीं होती। वहाँ से गुज़रो तो लगता है प्रकृति ने सारे रंग सिर्फ नारी के सौंदर्य को बढ़ाने के लिए ही बनाए है, (पुरुष वर्ग इस बात को लेकर मुँह न बिगाड़े, व्यक्ति कितना ही मोडर्न हो जाए, नारी को लेकर उसकी कल्पना आज भी बीसवीं सदी से आगे नहीं बढ़ी, आज भी उसके सपनों की मल्लिका उसे शुद्ध पारंपरिक परिधान में लिपटी, झुकी हुई नज़रों को चंचलता से उठाती हुई, पैर के अँगूठे से ज़मीन को कुरेदती हुई, शर्माती हुई ही नज़र आती होगी, ऐसा मुझे लगता है। आपकी कल्पना मेरी कल्पना से अलग भी हो सकती है!!!)....

Only For Ladies….जानबूझकर यह टाइटल रखा है... पुरुषों की जिज्ञासा को बहुत अच्छे से जानती हूँ.................हाँ तो जो पुरुष यह पढ़ रहे हैं उनके लिए खास टिप्स...टीनएजर्स- लो वेस्ट जींस में, उसके बाद की उम्र वाले जींस, टी-शर्ट और रफ एण्ड टफ लुक में, उसके बाद सफेदी की झनकार वाली ऑफिशियल शर्ट या स्ट्राइप्स वाली शर्ट्स में, पार्टी में नए स्टाइल का कोई भी सूट या डिज़ाइनर शर्ट...............यह आम महिलाओं की पसंद है पुरुष परिधानों में....लेकिन हाँ, टी-शर्ट आप अपनी पर्सनालिटी को सूट करता हुआ ही पहनें........

देखा बात शुरू हुई थी नारी के सौंदर्य से और खत्म हुई पुरुष परिधानों पर .....ऐसा कुछ भी नहीं है जो Only for ladies... या Only for gents ho... दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। सुंदरता शब्द के साथ अगर नारी का ज़िक्र होता है तो सुंदरता को परिभाषित करने के लिए हैं पुरुष, क्योंकि नारी नहीं कर सकती सौंदर्य की रचना शब्दों में....क्योंकि वह खुद आत्मसात करती है सुंदरता को स्वयं में.....

प्रतिक्रियाएँ

Re: Only For Ladies…..
great you are getting better day by day... changes happens always for better... keep it up
Re: Only For Ladies…..
शायद आपको यह भी पसंद आएगा....... http://shaifaly.mywebdunia.com/2007/12/19/1198068120000.html
Re: Only For Ladies…..
बहुत अच्छा लगा ,और काफी रोचक तरीके से आपने अपनी बात कही है,very nice....
Re: Only For Ladies…..
हि षैफल्ई i thing u know both the genders very well. u r comments are correct and accurate. keep it up. अनिल शर्मा
Re: Only For Ladies…..
सच कहा आपने, पुरुष ही कर सकता है क्योंकि अगर नारी करेगी तो सिर्फ वह ही कहा जा सकेगा जो वह सौंदर्य के प्रति सोचती है, पर जब पुरुष करता है तो उसके शब्दों मे जो उसे दिख रहा है के साथ, जो उसने देखना चाहा वह भी निहित रहता है, कुछ कल्पनाये, कुछ स्वप्न गुंथे होते हैं उसमे, ये मुग्ध दृष्टि नारी कहाँ से लाये, वो तो वही लिखेगी या कहेगी जो उसने भोगा है, अच्छा या बुरा !
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