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दूसरी दुनिया


वो जिद करती रही मैं खुश हूँ, तो खुशी को परिभाषित करूँ, मैं कहने ही वाली थी कि मेरी आँखें भर आई। मन प्रसन्न रहता है, तो शब्द चैन की नींद सो जाते हैं। ये बात मैं उसे नहीं समझा सकती थी। मेरी आँखों के आँसूं से वह मेरे खुश या उदास रहने का अनुमान लगाती रही। मेरे आँसूं देखकर पूछने लगी आप खुश नहीं फिर भी कैसे खुश रहते हो?

क्या कहती दिनभर में कितनी बार अपने दुख को अलग-अलग लिबास पहनाकर देखती हूँ, जिसमें वो सबसे सुंदर दिखाई दे उसे सबके सामने रख देती हूँ। और वो दुख खुशी के लिबास में घूमता रहता है। हाँ, शब्द सो जाते हैं, आँखें जागती रहती हैं, जब भर आती है तो फिर एक सवाल आप खुश नहीं? फिर खुद ही जवाब भी दे देती...”पता है आपकी एक अलग ही दुनिया है, जिसमें आप हमेशा रहते हो.....जैसा आप सोचते हो वैसा हो तो ठीक है, वर्ना आप उसे वैसा बना देते हो, खुद को परेशानी मे डाल लेते हो, बाहर निकलना भी जानते हो पर कुछ बातें जो बिना मतलब की हैं, उन्हें सोचकर रोने लगते हो। आपकी उस अलग सी दुनिया से मुझे प्यार है, आपके साथ हर पल बिताना चाहती हूँ पर आपको उदास नहीं देखना चाहती। प्यार खुश रहने का नाम है ना??
मुझे अपने साथ लेकर चले थे, कुछ देर मेरे साथ चल लो.....”

मेरे कुछ कहने से पहले ही वो सुख दुख की सारी परिभाषा मुझे समझा चुकी थी, और मैं नम आँखों के साथ चेहरे पर मुस्कान लिए उसके साथ चल दी, उसकी उस कल्पनाओं की दुनिया में जो उसे लगता है मेरी है और मुझे लगता है उसकी है।

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