
शब्दों की चरम सीमा को छूकर लौट आई हूँ खामोशी के पेहरन में, जैसे कोई आँगन की मिट्टी को माथे पर लगाकर अनजाने सफर को निकलता है.......................
“तुम्हारा नाम से मुझे बुलाना अच्छा लगा........”
”ठीक है, अब नाम से ही बुलाऊँगा.......”
”ठीक है...”
”कुछ और कहना चाहिए..”
”पूछ रहे हो या बता रहे हो?”
”पूछ रहा हूँ...”
“क्या कहना चाहिए?”
”मैं कैसे बताऊँ?”
”फिर रहने दो.............”
”किसको?”
”जो तुम नहीं जानते उन बातों को............”
”क्या नहीं जानता?”
”मुझे क्या पता?”
“फिर किसे पता है?”
”कोई नहीं जानता..............”
”कोई नहीं कौन है?”
”मैं”
”किसकी मैं?”
”किसी की नहीं”
”तो मैं कैसे हुई?”
”तभी तो सिर्फ मैं हूँ, उसकी नहीं हूँ................”
”फिर मैं को सब पता है?”
”हाँ क्योंकि वो जानकर भी अनजान है............”
“अब वो कौन है?”
”उसका कोई चेहरा नहीं, कोई भी हो सकता है......”
“वाह! बिना चेहरे का कोई भी....फिर क्या होगा?”
”कुछ भी नहीं.......”
“इसका मतलब बताना नहीं चाहती?”
”इसका मतलब कि इन बातों से अब कुछ नहीं हो सकता..............”
”तो किससे क्या हो सकता है?”
”किसी से कुछ भी नहीं....कभी नहीं.......”
“तो फिर....”
“तो फिर वही...कुछ भी नहीं”
”इसलिए कहता हूँ दुनिया गोल है”
”हाँ बिलकुल, जो नहीं मिलना होता वो कभी नहीं मिलता फिर चाहे वो आपके पास से कितनी ही बार गुज़र जाए.....”
”क्या नहीं मिला?”
”तुम”
”रोज तो मिलते हैं”
”हाँ, सही है”
”फिर?”
”तुम्हारे मिलने और मेरे मिलने में बहुत फर्क है।“
”मेरा मिलना मतलब?”
”रोज मिलना”
“और आपका मिलना?”
”वही जो रोज मिलकर भी कभी नहीं मिला...”
”क्या?”
”तुम”
“फिर मैं?”
”और कोई है भी तो नहीं......”
”फिर ‘कोई’......ये ‘कोई’ बड़ा फैमस है...”
”हाँ, मेरी दुनिया में तो सबसे ज्यादा फैमस है........”
”आपकी दुनिया में है वो कोई...कौन है वो?”
“एक जिन्न...”
”जिन्न?” ”हाँ, जो मुझसे कहे...क्या हुक्म है मेरे आका”
“फिर?”
“फिर अपनी ‘आखरी ख़्वाहिश’ कहती उससे”
”क्या?”
”यही कि एक बार उससे गले मिलकर रोना चाहती हूँ”
बस जितना कह सकती थी कह दिया था उसे, वो नहीं समझ सका... शब्दों की चरम सीमा को छूकर लौट आई हूँ खामोशी के पेहरन में..... जैसे कोई आँगन की मिट्टी को माथे पर लगाकर, अनजाने सफर को निकलता है।
वैसे भी पहली नज़र के प्यार को सिर्फ आकर्षण समझा जाता है। मन की ओझल परतों में फूटे उस पहले अंकुर का एहसास सिर्फ उसी को होता है, जो समय के साथ मन के रहस्यों को परत दर परत जानने लगता है और वो पहला प्यार अधूरे संवाद के साथ पूर्णता की खोज में निकल पड़ता है। फिर एक दिन मन की ओझल परत का पहला अंकुर जीवन की बंजर भूमि पर नवजीवन-सा उभरता है और संवाद पूरे हो जाते है।
वैसे ही कई सालों तक दिन गुजरते रहे, कई बरसों तक शामें ढलती रही............
और एक दिन फिर मुलाकात हुई..... पूछने लगा- “वो कोई कैसा है? कभी मिला या नहीं?”
मेरे मुँह से अचानक निकल गया- “हाँ आज मिल गया....”
उसने मुस्कुराते हुए पूछा-“ क्या हुक्म है मेरे आका?”
फिर उसका कंधा था, और मेरे आँसू, जो समय की परतों में कई बरस तक दबे रहे और जब निकले तो यूँ जैसे कोई ‘आखरी ख़्वाहिश’...................

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