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11 दिसंबर, 2007


ब्लॉग्स (1)
शब्दों की चरम सीमा को छूकर लौट आई हूँ खामोशी के पेहरन में, जैसे कोई आँगन की मिट्टी को माथे पर लगाकर अनजाने सफर को निकलता है..................... आगे पढ़ें...