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उदासी, आनंद, ओशो और मैं


कल शाम बच्चे दीवाली की बची हुई फुलझडियाँ जला रहे थे, उनके चेहरे पर आई हँसी के फव्वारे चारो ओर फैले हुए थे। हम भी उनके आनंद में शामिल हो गए। घर के सभी लोग खुश थे.....मैं भी। फुलझड़ियाँ खतम, लेकिन उनका आनंद अभी भी उछाल भर रहा था, सो मेरी बेटी एक अगरबत्ती जलाकर ले आई, और यूँ ही उसे पूरे घर में घुमाती रही।
रात बहुत हो चुकी थी, सब सो गए, लेकिन वो अगरबत्ती देर रात तक मेरे कमरे में जलती रही, मैं उसकी खूशबू में घुलती रही देर रात तक.............तब लगा सच खुशियाँ उस फुलझड़ी की तरह होती है, जिसने पलभर में पूरे घर को आनंदित कर दिया था, और उदासी उस अगरबत्ती की तरह जिसकी खूशबू में मैं देर रात तक अकेली घुलती रही................
ओशो को पढ़ना मेरे लिए मंदिर में पंडितों द्वारा किए जा रहे हवन में संस्कृत के उन श्लोकों को सुनने जैसा होता है, जिसका अर्थ मुझे नहीं पता होता, लेकिन उसकी ध्वनि, और कम्पन मुझे कहीं गहरे तक तरंगित कर जाती है।

प्रतिक्रियाएँ

Re: उदासी, आनंद, ओशो और मैं
आपका लेख पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि आपने ओशो को पढ़ा ही नहीं बल्कि समझा और जिया है। और जिसने ओशो को जी लिया उसे और कुछ समझने की जरूरत भी नहीं। आप यूँ ही उन्हें पढ़ती रहे तरंगित होती रहें और हमें भी उस तरंग का हिस्सा बनने दें।
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