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श्राप


एक समय था जब लगता था कि कुछ कायनाती कण हवा से होते हुए साँसों में घुल रहे हैं। मुझे पवित्रता की सुगंध से सराबोर लगती थी अपनी ही देह अक्सर, फिर न जाने क्या हुआ कि मैं कण कण बिखरती रही, घुलती रही मिट्टी में...और सूखती रही बंजर धरती की तरह.............

एक समय था कि मेरे विचारों का एक घर हुआ करता था। मेरा हर विचार संस्कारों की आग में जलकर कुंदन हो जाया करता था। अब ये है कि मेरा हर खयाल अनाथ सा हो गया है अपनी पहचान ढूँढ रहा है, संघर्ष कर रहा है कि भटकन की चरम सीमा तक पहुँचने के बाद भी कम से कम अपने ठिकाने पहुँच जाए............

एक समय था जब लगता था दुनिया बहुत बड़ी है और मुझे बहुत आगे जाना है। अब लगता है जैसे मैंने दुनिया को बहुत संकुचित कर दिया है और एक लक्ष्मण रेखा-सी मेरे आसपास स्वतः ही खींच गई है। मेरा मन जब भी उस सोने के मृग की तरफ जाता है जलकर राख हो जाता है...........

एक समय था जब लगता था मैं एक पत्थर की अहिल्या हूँ जिसे राम के आने की प्रतीक्षा है जो मुझे छूकर फिर से इनसान बना दें। अब लगता है कि मुझे सारी उम्र पत्थर ही रहना है, क्योंकि श्राप यह है कि राम मुझे छूकर पत्थर हो जायेंगे...............

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