प्रेम, विवाह और ओशो
जब ओशो का यह लेख लोगों को पढ़वाया, तो सब ने एक ही बात कही, ये तो ओशो है, इसमें आप कहाँ हो?
अब उनके लिए मुझे यह जवाब लिखना पड़ा...बहुत मुश्किल काम था ओशो के छोड़े गए सवाल का जवाब लिखना, क्योंकि न तो मैं प्रेम को परिभाषित कर सकती हूँ, न विवाह को, और न ही ओशो को। मेरे पास परिभाषित करने के लिए कुछ नहीं है, क्योंकि मैं खुद को बहुत धनी मानती हूँ, मेरे पास प्रेम भी है, विवाह भी और ओशो भी।
प्रेम और विवाह को ओशो के रूप में पढ़ना अच्छा लगता है, लोग वाह वाह कर उठते हैं, लेकिन हम आप जैसे आम लोग इस व्यवस्था पर कोई टिप्पणी करें, तो हजारों उँगलियाँ आपको घेर लेती हैं।
यह तो बस एक क्षण होता है, जब जीवन की संकुचित परिधी की घुटन से मन कुंठित हो उठता है, जब सच के आसमान पर उसे कल्पनाओं के पर फैलाने में परेशानी आती है, तो वो थक कर बैठ नहीं जाता वो बनाता है अपना एक नया आकाश…..और उसको नाम दे देता है...प्रेम, विवाह और ओशो।
यह तो बस एक क्षण होता है जब झूठ की दुर्गंध से साँसे थम जाती है और घुटन का चेहरा विकृत होने लगता है तो सच की स्वच्छंद और निर्भय हवाएँ तूफान बनकर आती है और उसका नाम हो जाता है...... प्रेम, विवाह और ओशो।
यह तो बस एक क्षण है जब उन अधूरी कहानियों को दोबारा पढ़ने का मन हुआ जिसे किस्मत का लिखा समझकर वक़्त के हवाले कर दिया था....और उसका नाम हो गया..... प्रेम, विवाह और ओशो ।

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