प्रेम का मतलब है: पल-पल जीना। प्रेम का मतलब है कि आज मैं आपको प्रेम करता हूँ, लेकिन कल का क्या भरोसा! कल के लिए मैं आज से कैसे निर्णय ले सकता हूँ! और मैं कल क्या करूँगा, उसका मैं आज से कैसे सुनिश्चित आश्वासन दे सकता हूँ!
इसलिए प्रेम मोमेंट टु मोमेंट लिविंग है--अभी और यहाँ।
नहीं, यह अर्थ नहीं है कि कल प्रेम टूट ही जाएगा! सच तो यह है कि अगर आज के क्षण में प्रेम जीया गया है तो कल और गहरा हो जाएगा। लेकिन वह अनिश्चित है, वह निश्चित नहीं है। पुनरुक्ति नहीं है, कि कल भी उसे दोहराने की कोई मजबूरी है।
तो प्रेम तो ऐसा है जैसे फूल है, सुबह खिलता है, सांझ मुरझा सकता है। उसी फूल के नीचे एक पत्थर पड़ा रहता है। वह पत्थर सांझ फूल से कहता है, पागल! इससे तो पत्थर होना बेहतर। क्योंकि हम कभी नहीं मुरझाते; हम जहां पड़े हैं वहीं पड़े रहते हैं। तू क्षणिक है, हम स्थायी हैं। लेकिन फिर भी स्थायी पत्थर को कोई क्षणिक फूल के मुकाबले नहीं चुनेगा।
अगर मैं आपको कहूँ तो कहना चाहूँगा कि प्रेम का फूल क्षण में खिलता है, मुरझाने का सदा डर है! इसीलिए उसका रस भी है, इसलिए उसका आकर्षण भी है, फूल इसीलिए इतने जोर से पुकारता भी है, क्योंकि सांझ नहीं होगा! पत्थर विवाह है, पड़ा है तो पड़ा है, वह अंत नहीं होता, उसकी कल बिलकुल सुनिश्चित व्यवस्था है। इसीलिए आकर्षणहीन है।
इसीलिए प्रेयसी को पत्नी बनाया नहीं कि प्रेयसी का आकर्षण गया नहीं। प्रेमी को पति बनाया नहीं कि आकर्षण गया नहीं। इधर प्रेमी पति बना, उधर अचानक पाया जाता है कि आकर्षण खो गया। क्योंकि चीजें सुनिश्चित हो गईं, स्थिर हो गईं। अब प्रेम मांगा जा सकता है, अब प्रेम की डिमांड की जा सकती है। अब अगर प्रेम न दिया जाए तो झगड़ा किया जा सकता है, अब अगर प्रेम न मिले तो कलह हो सकती है।
लड़के और लड़कियाँ जब एक-दूसरे से मिलते हैं, तो दोनों ही अभिनय कर रहे होते हैं, अपने चेहरे दिखा रहे होते हैं, अपनी असलियत नहीं। अगर इस क्षण में उन्होंने कोई निर्णय ले लिया, तो कल जब वे साथ जीएंगे तो आकाश के तारों के नीचे जिस लड़की को कविता की भांति पाया था, बर्तन मलते वक्त वह कविता नहीं रह जाएगी। बर्तन मलते वक्त वह बिलकुल भूत-प्रेत मालूम पड़ेगी। जिस लड़के में सुगंध ही सुगंध आई थी, जब वह दिन भर मेहनत करके खेत में, बगीचे में, फैक्ट्री में से लौटेगा तो उसके पसीने में बदबू आएगी। असल में समुद्र के तट पर जब मां-बाप की चोरी से कोई लड़का किसी लड़की को मिलता है, तो जो उसमें सुगंध आती है वह उसकी नहीं होती, वह फ्रेंच परफ्यूम की होती है। उसकी असली सुगंध तो जब वह खेत से मेहनत करके लौटेगा, फैक्ट्री से मेहनत करके लौटेगा, तब उसके शरीर का जो ओडर है, उसके शरीर की जो गंध है, वह पहली दफा पता चलेगी। उसके पहले तो जो सुगंधें हैं वे सब फ्रेंच के बाजारों में तैयार होती हैं, वे सुगंधें होंगी। उस सुगंध से प्रेम हो जाएगा, फिर पसीने की दुर्गंध का क्या होगा? बस टूटना शुरू हो जाएगा।
लेकिन अमेरिका में प्रेम-विवाह भी टूटता देख कर हिंदुस्तान का पुरोहित, पंडित, हिंदुस्तान का पुरातन-पंथी कहता है कि देखो, हम ही बेहतर हैं। हमारा विवाह बिलकुल ठीक चल रहा है। क्या सच है??????

लोड हो रहा है...
प्रतिक्रियाएँ