मैं कई सदियों तक जीती रही तुम्हारे विचारों का घुंघट अपने सिर पर ओढे, मैं कई सदियों तक पहने रही तुम्हारी परम्पराओं का परिधान, कई सदियों तक सुनती रही तुम्हारे आदेशों को, दोहराती रही तुम्हारे कहे शब्द, कोशिश करती रही तुम जैसा बनने की। तुम्हारे शहर ...
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