आज पहली बार प्रतीत हुआ, प्रेम किसे कहते है......
ओशो को बहुत बार पढ़ा है, सिर्फ पढ़कर ही मुग्ध हो जाया करती थी, लेकिन आज जैसे उनके द्वारा लिखा गया एक-एक शब्द मुझे अपने जीवन से गुजरता हुआ मेहसूस हो रहा है। दो लोगों का एक जैसा मेहसूस करना और एक दूसरे के चेहरे पर आए एक-एक भाव को पहचान लेना, प्रेम इसे ही तो कहते है।
हम प्रेम को दुनियावी रिश्तों के साथ नहीं जोड़ सकते। अलौकिक प्रेम का कोई भी रूप हो सकता है बशर्ते उसे स्वीकार करने की हिम्मत हो। लेकिन इस अलौकिक रिश्ते को साथ लेकर जीना तो हमें इसी दुनिया में है।
“हाँ, यहाँ हर इनसान दो दुनिया में एक साथ जीता है, यही नियती है, यही लिखा है हर एक की किस्मत में, मेरी तुम्हारी, सबकी, इसे स्वीकार करो, अपनी ही दुनिया में द्वंद्व मत होने दो, तुम्हें दोनों दुनिया एक-साथ जीना होगी।“
मैं समझाती रही उसे, लेकिन वह अपनी दुनिया से बाहर निकलने को तैयार नहीं थी।
”ठीक है मैं अपनी आँखों में तुम्हारे सपने को देख लेती हूँ। तुम जिससे कहोगी मैं प्यार कर लूँगी।“
उसके लिए कितना आसान था यह सब कहना.... मेरे लिए जैसे एक तीसरी दुनिया का रास्ता खुल गया था। उसके अंतर्द्वंद्व को खत्म करने के लिए उसकी दूसरी दुनिया को भी मैं जीने लगी। उसकी दुनिया के सच को साक्षी बनाकर एक नई दुनिया का निर्माण करने लगी। कुछ दुनियावी रिश्ते बनाने लगी थी, उसे उन रिश्तों में जीने को कहती, वो उलझ जाती तो हल निकालती, फिर कोई नया तरीका ...सिर्फ इसलिए कि उसे दो दुनिया के साथ जीना सीखा सकूँ......
...लेकिन वो सच कहती थी “मैं अपनी आँखों से तुम्हारे सपने को देखना चाहती हूँ.... “
वो मेरा सपना पहचान गई थी, मैं दुनियावी रिश्तों से नज़र चुराकर एक अलौकिक प्रेम का बीज अपने सपनों में बो चुकी थी..........|

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