रात की चादर पर
चुभता-सा ख़्वाब
हुआ करता था कभी
अब तकिया भी नींद में सराबोर-सा लगता है
उजली रात के आसमान पर
तारे भटकते थे कभी
आज चाँद भी घर लौट आया-सा लगता है
एक तन्हाई, दो बातें
बस इतना-सा सामान है मेरे पास
यादों की छत पर भी जाला-सा दिखता है
आखरी मुलाकात पर
तुम्हारी गर्दन पर खरोंच देखी थी
तब से अपना हर दर्द पराया-सा लगता है

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