Webdunia: Portal - Search - Mail - Greetings   More >>
Support | Font Download | Feedback
Search  
Welcome, Guest  [ Register | Sign In ]

गर्दन पर खरोंच


रात की चादर पर
चुभता-सा ख़्वाब
हुआ करता था कभी
अब तकिया भी नींद में सराबोर-सा लगता है

उजली रात के आसमान पर
तारे भटकते थे कभी
आज चाँद भी घर लौट आया-सा लगता है

एक तन्हाई, दो बातें
बस इतना-सा सामान है मेरे पास
यादों की छत पर भी जाला-सा दिखता है

आखरी मुलाकात पर
तुम्हारी गर्दन पर खरोंच देखी थी
तब से अपना हर दर्द पराया-सा लगता है

अस्वीकरण