प्रेम का उजाला
जब रात की देह में घुल जाता है....
तो कोई चेहरा नही दिखता
बस शांत मन से बिछड़कर
देह में शोर मचाता है...........
अकेले जीने की जिद में
सारे चेहरे धुंधले पड़ जाते है
जब कभी कोई याद का चेहरा करीब आता भी है
तो पहचानने में समय लग जाता है
फिर याद तो याद है
अतित के रेगिस्तान में
वर्तमान की मरिचिका सी.....
कब तक रहता उसका भी अस्तित्व,
पानी के बुलबुले सी ख़्वाहीश के साथ खत्म हो जाती है
रह जाता है तो
प्रेम का उजाला
रात की देह में घुलता सा...............

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