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प्रेम का उजाला


प्रेम का उजाला
जब रात की देह में घुल जाता है....
तो कोई चेहरा नही दिखता
बस शांत मन से बिछड़कर
देह में शोर मचाता है...........
अकेले जीने की जिद में
सारे चेहरे धुंधले पड़ जाते है
जब कभी कोई याद का चेहरा करीब आता भी है
तो पहचानने में समय लग जाता है
फिर याद तो याद है
अतित के रेगिस्तान में
वर्तमान की मरिचिका सी.....
कब तक रहता उसका भी अस्तित्व,
पानी के बुलबुले सी ख़्वाहीश के साथ खत्म हो जाती है
रह जाता है तो
प्रेम का उजाला
रात की देह में घुलता सा...............

प्रतिक्रियाएँ

Re: प्रेम का उजाला
वाह
Re: प्रेम का उजाला
प्रेम मिथ्या तो नही? प्यार बस एक ख्याल तो नही?
Re: प्रेम का उजाला
प्रेम मिथ्या नहीं होता सिर्फ प्रेम होता है...सच और मिथ्या के परे उसकी अपनी के दुनिया होती है...जैसे क्षितीज में डूबते सूरज को आप मेहसूस कर सकते हैं, छू नहीं सकते.....
Re: प्रेम का उजाला
अच्छी कविता है। यहां आ कर अच्छा लगा।
अस्वीकरण