कई दिन कई रातें बीतती रही,
साँसे चलती थी जीवन नहीं,
समय को कस लिया था मोटी जंज़ीरों में ....
खामोशी को रोक लिया था बाँहों में....
बस एक मृत देह की तरह.....................
विश्वास बचा था आत्मविश्वास नहीं,
बातों से शब्द खो गये थे
आँखों से आँसू...........
दोबारा उसी घाट पर खड़ी हूँ
जहाँ आत्मा का विसर्जन किया था
माथे से लगाया है फिर उसी जल को
लगा देह जीवीत हो चुकी है
...............वो आत्मा कभी लौट कर नहीं आ सकती
...लेकिन मैं तो उस जल में समा सकती हूँ....
जैसे मृत देह को विसर्जित किया जाता है
जब उसका कोई वारीस नहीं होता..............

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