मैं अपने ही जीवन की मूक दर्शक
अकसर देखती हूँ
समय को अपने पास से गुज़रते हुए
और जाते हुए एक और दिन को
उसी तरह नीरस और नीर्जिव
जैसे तुम अकसर निकल जाते हो
मेरे करीब से
और मैं खड़ी रह जाती हूँ
उस पल की प्रतीक्षा में
जो जीवित कर जाए
उम्र के उस हिस्से को
जो निर्जिव हो चुका है
मेरे हृदय की तरह..

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