मेरे रिश्तों का पेहरेदार है वो
वो कहीं चला जाता है
तो मैं समन्दर के किनारे
रेत के टीले-सा कोई रिश्ता बना लेती हूँ
वक़्त की लहरे आती है
सबकुछ बहा ले जाती है अपने साथ
मैं शिकायती लहज़े में
उसकी तंख्वाह से काट लेती हूँ
कभी सपने देखने का अधिकार
तो कभी ख्वाहीशों का इज़हार
वो मेरे विचारों से परे
मेरे विचारों का पेहरेदार...
अन्दर नहीं आने देता है किसी को
मैं अपने ही घर में चोरी की नियत से भेज देती हूँ
किसी ख़याल को चोर दरवाजे से
तो पता लग जाता है उसे
मैं अकसर रंगे हाथों पकडा जाती हूँ
वो मेरे रिश्तों का पहरेदार
नहीं करने देता कोई अवैध निर्माण ।

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