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मन की व्यथाओं के पीछे दौड़ती अधूरी कविता,,,,,


समझौतों की शर्तों पर
ईच्छाओं की बलि चढ़ाकर
जीवन निर्माण नहीं होता.....

रात की गली में
नींद को आवाज़ लगाकर
स्वप्न निर्माण नहीं होता.....

घर के आँगन में
रिश्तों को बोकर
खुशियों का निर्माण नहीं होता....

दहलीज़ तक जाकर
लौट आने से
सफर का निर्माण नहीं होता.....

निर्माण होता है
उन इमारतों का जो अक्सर अधूरी रह जाती है,
जिनमें सिर्फ किस्से रहते हैं.....
चेतन मन की अतृप्त कामनाओं के भटकने के,
जो जन्म लेती हैं
अचेतन मन की तृप्त कामनाओं की कोख से...........
उसी कोख से
जहाँ निर्माण होता है
जीवन का
समझौतों की शर्तों से परे
जहाँ निर्माण होता है स्वप्न का
रात की जलती हुई भट्टी से परे
जहाँ निर्माण होता है खुशियों का
आँगन में उगते रिश्तों से परे
जहाँ निर्माण होता है सफर का
मंज़िल तक पहुँचने की
जद्दोजहद से परे...........

अस्वीकरण