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28 नवंबर, 2007


ब्लॉग्स (5)
मैं अपने ही जीवन की मूक दर्शक अकसर देखती हूँ समय को अपने पास से गुज़रते हुए और जाते हुए एक और दिन को उसी तरह नीरस और नीर्जिव जैसे तुम अकसर निकल जाते हो मेरे करीब से और मैं खड़ी रह जाती हूँ उस पल की प्रतीक्षा में जो जीवित कर जाए उम्र के उस हिस्से को ... आगे पढ़ें...

मेरे रिश्तों का पेहरेदार है वो वो कहीं चला जाता है तो मैं समन्दर के किनारे रेत के टीले-सा कोई रिश्ता बना लेती हूँ वक़्त की लहरे आती है सबकुछ बहा ले जाती है अपने साथ मैं शिकायती लहज़े में उसकी तंख्वाह से काट लेती हूँ कभी सपने देखने का अधिकार तो कभी ... आगे पढ़ें...

समझौतों की शर्तों पर ईच्छाओं की बलि चढ़ाकर जीवन निर्माण नहीं होता..... रात की गली में नींद को आवाज़ लगाकर स्वप्न निर्माण नहीं होता..... घर के आँगन में रिश्तों को बोकर खुशियों का निर्माण नहीं होता.... दहलीज़ तक जाकर लौट आने से सफर का निर्माण नहीं ... आगे पढ़ें...