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प्रेम


प्रेम
एक बच्चे की ड्राँइंग कॉपी जैसा,
पेंसिल और रंगो को हाथ में लेकर उसके जो मन में आता है बनाता है, उसमें तरह-तरह के रंग भरता है। उसकी कल्पना को कोई नहीं पकड़ सकता। वो चाहे तो जोकर बना दे, चाहे तो हाथी, चाहे तो एक छोटा-सा घर और आसमान में उड़ती चिड़ियाएँ........ वो चाहे तो आसमान को हरा कर दे, पानी को लाल और हाथी को पीला।

प्रेम
आसमान में उड़ती चिड़िया जैसा, स्वच्छंद आकाश पर, सपनों के पर लगाकर उड़ता रहता है, उसे नहीं पता होता उसे कहाँ जाना है? आसमान की तुलना में उसका कोई अस्तित्व नहीं, लेकिन उसके लिए पूरा आसमान उसका अपना है।

प्रेम
समन्दर के किनारे बरसों से खड़ी चट्टानों जैसा, जिसे कोई टस से मस नहीं कर पाता, लेकिन समय की लहरों के थपेड़ों को लगता है उसने उसे रेत कर दिया है, लेकिन उसे ये नहीं पता कि समन्दर की ही तरह रेत के किनारों का अस्तित्व भी फैल गया है चारो ओर.....और वो समन्दर उसके रेतीले किनारों की वजह से ही सुंदर दिखता है।

प्रेम
मेरी आँखों में बंद तस्वीरों जैसा, जब भी बहती है, मैं आँसूं पोंछ लेती हूँ कि पता नहीं चेहरे पर कौन-सी तस्वीर उभर आए..............

अस्वीकरण