जंगलों में गुज़र जाते है कई बरस
लगता है आज भी इनसान है हम
आता है अब भी रोना, हँसना और बिखर जाना
और उसी शिद्दत से संभालना खुद को
जैसे हर बार संभाल लेते है टूट कर
लगता है आज भी इनसान है
जब तप जाते है आँखों के रेगिस्तान
और मुस्कुराहट की ज़मीं पर
उग आती है सजावटी झाडियाँ
तब आता है उसे उखाड कर
नए विश्वास के साथ नई मुस्कुराहट सजाना
लगता है आज भी इनसान है
कि दिल को संभाल लेते है हर बार
एक नई मोहब्बत के साथ
सोचकर कि इन्हीं जंगलों से निकलता होगा
कोई रास्ता
जो ले जाए इनसानों के शहर में........................

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