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27 नवंबर, 2007


ब्लॉग्स (3)
प्रेम एक बच्चे की ड्राँइंग कॉपी जैसा, पेंसिल और रंगो को हाथ में लेकर उसके जो मन में आता है बनाता है, उसमें तरह-तरह के रंग भरता है। उसकी कल्पना को कोई नहीं पकड़ सकता। वो चाहे तो जोकर बना दे, चाहे तो हाथी, चाहे तो एक छोटा-सा घर और आसमान में उड़ती ... आगे पढ़ें...

जंगलों में गुज़र जाते है कई बरस लगता है आज भी इनसान है हम आता है अब भी रोना, हँसना और बिखर जाना और उसी शिद्दत से संभालना खुद को जैसे हर बार संभाल लेते है टूट कर लगता है आज भी इनसान है जब तप जाते है आँखों के रेगिस्तान और मुस्कुराहट की ज़मीं पर उग आती ... आगे पढ़ें...

तलब जिस्मानी नहीं, रूह से एक कसक उठी और दौड पडी हैं रग़ो में तड़प बनकर मैंने अपनी तड़प का चाँद बेचकर तेरे इश्क का आसमां खरीद लिया सोचकर कि तू जब भी बरसेगा मेरी तलब के लबों को दो बूँद नसीब होगी या रब ! ये कैसा इम्तिहां है कि जिस्म बाग़ी नहीं मगर रूह ... आगे पढ़ें...