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एक दिन यूँ ही


एक दिन यूँ ही तन्हा रातों के अंधियारो से
उजालों का पता पूछ लिया
मेरी डायरी के पन्ने फड़फड़ाने लगे,
उनींदी सी नज़रो से तेरे घर के पते को देखा
और कब आँख लगी पता न चला ,

सुबह सूरज की किरणों को अपने पंखो में समेट कर
उम्र की तितली को खिड़की से आते हुए देखा,
आईने में सूरत ज़रूर देखी,
लेकिन सोलहवे साल के बीत जाने का पता न चला

दिन भर तितली के पंखो से रंग चुराती रही,
दरो दीवार पर उसे फैलाती रही,
किसी ने देखा तो झट से हाथ पोंछ लिये,
चुनरिया पर रंग लग जाने का पता न चला,

एक दिन यूँ ही
रात के अंधियारो से उजालो का पता पूछ रही थी
तेरे कदमो की आहट सुनी
तन्हाई के चले जाने का पता ही न चला।

अस्वीकरण