ओ रोटी की मम्मी
जरा इधर तो आओ,
इस सब्जी की बेटी को कुछ समझाओ
जरा सा नमक
जरा सी मिर्च में ही
इतराने लग जाती है
कुछ ज्यादा पड़ जाए
तो फेंकने में ही तो जाती है।
कभी ये जलती
कभी ये भुनती
कभी तो कच्ची ही रह जाती है।
भूख लगी हो तो
घी-शक्कर वाली रोटी भी चल जाती है।
लगी सब्जी की बेटी रोने
रोटी की डांट सुनकर
लाई बुला अपनी मम्मी को
कम तेल में ही जलभुन कर
सब्जी की मम्मी चिल्लाई
मैं ना होऊँ तो विटामिन्स कहां से मिलेंगे ?
सिर्फ सूखी रोटी को खाकर
बच्चे कैसे सेहतमंद बनेंगे?
दोनों की सुनकर लड़ाई
दाल-चावल को सुध आई
लगे समझाने दोनों
कि हम सब हैं बहन भाई
इक दूजे के बिना काम चलता नहीं
कोई एक भी न हो तो बच्चा सेहतमंद बनता नहीं
आओ हम मिलजुल कर सजाएँ थाली
सुनकर दाल-चावल की बात पापड़ सलाद बजाने लगे ताली।

लोड हो रहा है...