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मेरी बेटी की कविताएँ

टूटा तारा


एक दिन तारा टूटकर
गिरा मेरी छत पर
मैं छत पर सो रहा था
तारा मेरे उपर
वह डर गया
कहने लगा रोकर
मैं डर गया हूँ
मुझे मेरे घर पहुँचा दो
हाँ मैं पहुँचा दूँगा
पर करने होंगे काम दो
पहला चाँद को करो गुदगुदी
दूसरा रोते बच्चों को देनी होगी खुशी

कृमेशा

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