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कल रात मेरी बाहों के दर्पण में तुम एक अक्स बनकर आए और चुराकर ले गये रात के जंगल से नींद की तितलियाँ सुबह से बैठी हूँ दर्पण के सामने कि मेरे ख्वाबों को शक्ल नसीब हो...........
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