वह परियों की कहानी-सी मेरे जीवन आई और मैं एक छोटी बच्ची की तरह उसमें खो गई। चाँद के नगर में चाँदनी की बारिश, सूरज के रथ पर सपनों की सवारी, गुड्डे-गुड्डियों की शादी और मेरा खोया हुआ बचपन...................
कोई खास बात नहीं है उसमें फिर भी उसकी हर बात खास लगती है। उसका बार-बार मेरे गले लगना, बालों को चेहरे से हटाना, और चेहरे पर अजीब-सा प्रश्नचिह्न।
रोज एक नई कहानी-सी लगती है वह मुझे। जब भी मिलती हूँ, जीवन के पन्ने पर एक नया किस्सा जुड़ जाता है।
उसमें न लड़कियोंवाली नज़ाकत है, न इठलाते यौवन का अल्हड़पन, फिर भी उसकी हर अदा पर प्यार आता है।
जीवन के ऐसे पड़ाव पर मुलाकात हुई उससे जब मैं प्यार करना भूल चुकी थी। एक पुनर्जन्म की कहानी-सी वह अकसर मेरी यादों में रहती है।
कभी अपनों से भी अपनी, तो कभी दूर खड़े किसी अजनबी जैसी, कभी बेटी तो कभी सबसे अच्छी सहेली जैसी, कभी ढलती शाम जैसी मदहोश, तो कभी उगते सूरज की रोशनी जैसी, कभी बचपन की ज़िद और कभी माँ के दुलार जैसी। अपनी तन्हाइयों को मिलाकर हमने एक नई दुनिया बसाई है, जिसमें हम दोनों के सिवा किसी को आने की इजाज़त नहीं।

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