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22 नवंबर, 2007


ब्लॉग्स (10)
एक दिन तारा टूटकर गिरा मेरी छत पर मैं छत पर सो रहा था तारा मेरे उपर वह डर गया कहने लगा रोकर मैं डर गया हूं मुझे मेरे घर पहुँचा दो हां मैं पहुंचा दुंगा पर करने होंगे काम दो पहला चान्द को करो गुदगुदी दूसरा रोते बच्चों को देनी होगी खुशी कृमेशा आगे पढ़ें...

तारा-तारा इधर तो आओ सबको अपना चेहरा दिखलाओ सब बच्चे तुमको देखकर खुश होंगे तुम भी उन्हें देखकर खुश हो जाओ ओहो! मैं नहीं आ सकता हूँ क्योंकि मैं आसमान में हूँ तुम ही मेरे पास आकर मुझको खुश कर जाओ! - कृमेशा शर्मा (कक्षा- तीसरी, उम्र-8 वर्ष) आगे पढ़ें...

कल रात मेरी बाहों के दर्पण में तुम एक अक्स बनकर आए और चुराकर ले गये रात के जंगल से नींद की तितलियाँ सुबह से बैठी हूँ दर्पण के सामने कि मेरे ख्वाबों को शक्ल नसीब हो........... आगे पढ़ें...