हर शाम दामन बचाकर निकल जाती हूँ फिर भी कोई धागा छूट गया सा लगता है....
जैसे कल छोड़ गई थी पुरानी बातों का एक किस्सा...एक अधूरा सा किस्सा.. इस उम्मीद में कि तुम आवाज़ लगाओगे
और मैं पलट कर मुस्कुरा दुंगी
तुमने पुकारा नहीं
लेकिन मैं रात भर मुस्कुराती रही.............

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