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15 नवंबर, 2007


ब्लॉग्स (2)
रात की चादर पर चुभता-सा ख़्वाब हुआ करता था कभी अब तकिया भी नींद में सराबोर-सा लगता है उजली रात के आसमान पर तारे भटकते थे कभी आज चाँद भी घर लौट आया-सा लगता है एक तन्हाई, दो बातें बस इतना-सा सामान है मेरे पास यादों की छत पर भी जाला-सा दिखता है आखरी ... और पढ़ें...

हर शाम दामन बचाकर निकल जाती हूँ फिर भी कोई धागा छूट गया सा लगता है.... जैसे कल छोड़ गई थी पुरानी बातों का एक किस्सा...एक अधूरा सा किस्सा.. इस उम्मीद में कि तुम आवाज़ लगाओगे और मैं पलट कर मुस्कुरा दुंगी तुमने पुकारा नहीं लेकिन मैं रात भर मुस्कुराती ... और पढ़ें...