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नवंबर 2007

 

• प्रेम का उजाला

प्रेम का उजाला जब रात की देह में घुल जाता है.... तो कोई चेहरा नही दिखता बस शांत मन से बिछड़कर देह में शोर मचाता है........... अकेले जीने की जिद में सारे चेहरे धुंधले पड़ जाते है जब कभी कोई याद का चेहरा करीब आता भी है तो पहचानने में समय लग जाता है फिर याद ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• बस एक मृत देह की तरह ............

कई दिन कई रातें बीतती रही, साँसे चलती थी जीवन नहीं, समय को कस लिया था मोटी जंज़ीरों में .... खामोशी को रोक लिया था बाँहों में.... बस एक मृत देह की तरह....................   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: अधूरी कहानियाँ
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• आँखों की नमी

बरसों-से फैले रेगिस्तान में आखरी बूँद उम्मीद की कि कोई आएगा मरिचिका को पार कर अपने हाथों में प्रेम का पानी लिए और मैं उसे अपनी आँखों में भर लूँगी कि मिलन की अंतिम घड़ी में लब सूखे भी हो तो चलेगा आँखों से नमी नहीं जानी चाहिए..................   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• कच्ची मिट्टी-सा रिश्ता

वो एक कच्ची मिट्टी-सा रिश्ता और मैं एक नौसीखिया कुम्हार... कई बार चढ़ाया उसे चक्र पर, कई बार बिगड़ा मेरे हाथों से, पर हिम्मत नहीं हारी तेड़ी मेड़ी शक्लें देता रहा इस उम्मीद में कि किसी दिन सीख जाऊँगा मैं भी रिश्तों को गढ़ना, सुंदर आकार देना वो एक ...   और पढ़ें...
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• प्रतीक्षा

मैं अपने ही जीवन की मूक दर्शक अकसर देखती हूँ समय को अपने पास से गुज़रते हुए और जाते हुए एक और दिन को उसी तरह नीरस और नीर्जिव जैसे तुम अकसर निकल जाते हो मेरे करीब से और मैं खड़ी रह जाती हूँ उस पल की प्रतीक्षा में जो जीवित कर जाए उम्र के उस हिस्से को ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• रिश्तों का पेहरेदार

मेरे रिश्तों का पेहरेदार है वो वो कहीं चला जाता है तो मैं समन्दर के किनारे रेत के टीले-सा कोई रिश्ता बना लेती हूँ वक़्त की लहरे आती है सबकुछ बहा ले जाती है अपने साथ मैं शिकायती लहज़े में उसकी तंख्वाह से काट लेती हूँ कभी सपने देखने का अधिकार तो कभी ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरा कोना
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• मन की व्यथाओं के पीछे दौड़ती अधूरी कविता,,,,,

समझौतों की शर्तों पर ईच्छाओं की बलि चढ़ाकर जीवन निर्माण नहीं होता..... रात की गली में नींद को आवाज़ लगाकर स्वप्न निर्माण नहीं होता..... घर के आँगन में रिश्तों को बोकर खुशियों का निर्माण नहीं होता.... दहलीज़ तक जाकर लौट आने से सफर का निर्माण नहीं ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: अधूरी कहानियाँ
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• खाली आँखें

कई रात जगाया इन आँखों को, अब ख़्वाब देखना आता नहीं कोई बरबस ही पानी भर आता था उस गहरे कुँए से झाँकता नहीं कोई मन के खाली बर्तन में धूल जम जाती है खाली से आँगन से धूप लौट जाती है सूरज फिर भी धकेल दिया जाता है अलसाते चाँद को रह रह कर जगाता नहीं कोई ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• एक रात

अपने भीतर की सर्द रातों में अकसर तन्हाई का लिहाफ ओढ़ लेती हूँ जुनून की राह से गुजरती यादो को हाथ बढा कर रोक लेती हूँ सुनाती हूँ किस्से उन चंद लम्हों के जो उम्र से जुड़कर जीवन हो गए फिर उसी जीवन से कुछ हादसे चुराकर नई कहानी जोड़ लेती हूँ घूमकर आती ...   और पढ़ें...
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• प्रेम

प्रेम एक बच्चे की ड्राँइंग कॉपी जैसा, पेंसिल और रंगो को हाथ में लेकर उसके जो मन में आता है बनाता है, उसमें तरह-तरह के रंग भरता है। उसकी कल्पना को कोई नहीं पकड़ सकता। वो चाहे तो जोकर बना दे, चाहे तो हाथी, चाहे तो एक छोटा-सा घर और आसमान में उड़ती ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• जंगल

जंगलों में गुज़र जाते है कई बरस लगता है आज भी इनसान है हम आता है अब भी रोना, हँसना और बिखर जाना और उसी शिद्दत से संभालना खुद को जैसे हर बार संभाल लेते है टूट कर लगता है आज भी इनसान है जब तप जाते है आँखों के रेगिस्तान और मुस्कुराहट की ज़मीं पर उग आती ...   और पढ़ें...
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• तलब

तलब जिस्मानी नहीं, रूह से एक कसक उठी और दौड पडी हैं रग़ो में तड़प बनकर मैंने अपनी तड़प का चाँद बेचकर तेरे इश्क का आसमां खरीद लिया सोचकर कि तू जब भी बरसेगा मेरी तलब के लबों को दो बूँद नसीब होगी या रब ! ये कैसा इम्तिहां है कि जिस्म बाग़ी नहीं मगर रूह ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• ज़िन्दगी

ज़िन्दगी सहूलियतों का खेल नहीं क़िस्मत के हाथों लिखी कोशिशों की वसीयत है जिस पर परिणाम के हस्ताक्षर नहीं ज़िन्दगी बिछड़े हुओ का मेल नहीं इंतज़ार की ज़मीं पर मीलों चलने वालों के हाथों में पहचाने से पतों की कतरन है जिस पर शहर का नाम नहीं ज़िन्दगी दो ...   और पढ़ें...
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• एक दिन यूँ ही

एक दिन यूँ ही तन्हा रातों के अंधियारो से उजालों का पता पूछ लिया मेरी डायरी के पन्ने फड़फड़ाने लगे, उनींदी सी नज़रो से तेरे घर के पते को देखा और कब आँख लगी पता न चला , सुबह सूरज की किरणों को अपने पंखो में समेट कर उम्र की तितली को खिड़की से आते हुए देखा, ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• एक गीत बच्चों के लिए

Taare Zameen Par Lyrics

पहला गीत जो पहली बार में ही सम्मोहित कर गया.....   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरी दुनिया
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• मेरी रसोई से

एक गैस स्टव, चार बर्तन, कुछ सब्जियाँ और मसाले.........इतना ही काफी होता है शायद कोई भी डिश बनाने के लिए...नहीं? यदि हाँ तो फिर माँ के हाथों में ऐसा क्या जादू है, जो हॉटेल के शेफ के हाथों में नहीं? हॉस्टेल में रहनेवाले स्टूडेंट्स को अपने टिफिन के बजाय ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरी दुनिया
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• सब्जी रोटी की लड़ाई

ओ रोटी की मम्मी जरा इधर तो आओ, इस सब्जी की बेटी को कुछ समझाओ जरा सा नमक जरा सी मिर्च में ही इतराने लग जाती है कुछ ज्यादा पड़ जाए तो फेंकने में ही तो जाती है। कभी ये जलती कभी ये भुनती कभी तो कच्ची ही रह जाती है। भूख लगी हो तो घी-शक्कर वाली रोटी ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरी दुनिया
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• Human mind

Sometimes I think its better not to talk, sometimes I think its better to talk & get the problems solved, sometimes I think there is no problem, sometimes I think Im a problem which has no solution, sometimes I think you dont know how to solve problem, ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरा कोना
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• हम सिर्फ अच्छे दोस्त हैं

अकसर कहा जाता है कि दोस्ती से बढ़कर ऐसा कोई संबंध नहीं, जिसमें सभी संबंधों की आत्मीयता महसूस की जा सके, लेकिन जब यही दोस्ती एक लड़की और लड़के के बीच होती है, तो हमारा समाज उसे वो सम्मान नहीं दे पाता जो अन्य संबंधों को सहजता से दिया जाता है। कहा जाता है कि ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरा कोना
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• अहिल्या

मै एक अहिल्या पत्थरों के नगर की राजकुमारी, पत्थर के सपने, पत्थर की देह...... और एक इंतज़ार....... राम के आने का जो उसे छूकर बना दे एक औरत, एक संपूर्ण औरत…… एक औरत जो सिर्फ प्यार करना जानती है कभी माँ बनकर, कभी पत्नी, कभी प्रेमिका, और कभी कुछ भी ...   और पढ़ें...
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• आध्यात्म

आध्यात्म, एक यात्रा है विचारों की, और विचार? विचार, एक द्वंद्व है, द्वंद्व इच्छाओं का, भावनाओं से द्वंद्व अपना-अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए। इच्छा, रेगिस्तान में भटकते राही की तरह भौतिकता की मरीचिका की ओर आकर्षित। इच्छा ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती है ...   और पढ़ें...
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• खरपतवार

सीने में उठते सारे ग़ुबार बर्फ से जम चुके हैं, आँसूं सिर्फ आँखों को धो रहे हैं, दिल के बादल अब भी नहीं बरसे हैं। अपना रिश्ता बंजर भूमि पर खरपतवार-सा उग आया है। तुम कितना ही इश्क का पानी देते रहो, खरपतवार पर सुगंधित फूल नहीं उगते। बस उम्र को यूँ ही बालों ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: अधूरी कहानियाँ
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• मेरी बेटी की कविताएँ

टूटा तारा

एक दिन तारा टूटकर गिरा मेरी छत पर मैं छत पर सो रहा था तारा मेरे उपर वह डर गया कहने लगा रोकर मैं डर गया हूं मुझे मेरे घर पहुँचा दो हां मैं पहुंचा दुंगा पर करने होंगे काम दो पहला चान्द को करो गुदगुदी दूसरा रोते बच्चों को देनी होगी खुशी कृमेशा   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरी दुनिया
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• एक तारा

तारा-तारा इधर तो आओ सबको अपना चेहरा दिखलाओ सब बच्चे तुमको देखकर खुश होंगे तुम भी उन्हें देखकर खुश हो जाओ ओहो! मैं नहीं आ सकता हूँ क्योंकि मैं आसमान में हूँ तुम ही मेरे पास आकर मुझको खुश कर जाओ! - कृमेशा शर्मा (कक्षा- तीसरी, उम्र-8 वर्ष)   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरी दुनिया
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• बाहों के दर्पण में

कल रात मेरी बाहों के दर्पण में तुम एक अक्स बनकर आए और चुराकर ले गये रात के जंगल से नींद की तितलियाँ सुबह से बैठी हूँ दर्पण के सामने कि मेरे ख्वाबों को शक्ल नसीब हो...........   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• उजाले अपनी यादों के

बशीर बद्र

कभी तो आस्मां से चाँद उतरे जाम हो जाए तुम्हारे नाम की एक ख़ुबसूरत शाम हो जाए मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहाँ होगा परिंदा आस्मां छूने में जब नाकाम हो जाए उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: मेरा कोना
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• बंद कमरे की घुटन

बंद कमरे की घुटन-सी तपीश और खिड़की से झाँकती ज़िंदगी.... एक मन कमरे में और एक मन खिड़की पर टिकाए एक इंतज़ार.................   और पढ़ें...
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• यादें

रात तेरी याद का चाँद खिला चाँदनी को आँगन में फैला आई हूँ जैसे तन के जंगलों से गुजरकर मन के घर रहने आई हूँ ढूँढने निकली थी जंगलों में दास्तां के दरख्त को, जब लबों से लगाया तो लगा खामोशी के पेड से कोई हर्फ तोड लाई हूँ इंतज़ार के बादलों का रूख बदल दिया, ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: दो दुनिया
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• तुमसे मिलने के बाद

उम्र आँगन के पार गलियों में झाँकनेवाली तो नहीं थी, फिर भी आँखों की किलकारियाँ बाज नहीं आती थी। चंचलता को आँखों में ओझल करना मेरे बस में नहीं था। बस ऐसे ही दिन निकल रहे थे, कभी यौवन के साथ लुकाछीपी का खेल खेलते हुए, तो कभी संयम के डोरों को बस हाथों से ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: अधूरी कहानियाँ
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