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खामोशी का गीत

शायद शब्द कम पड रहे है..... नहीं...... शायद हमेशा की तरह ही उसे शब्दों में ढालना मुश्किल हो रहा है, नहीं..... शायद विचलित मन की व्यथा को परिभाषित करने के लिए बहुत से शब्द होते है लेकिन मन जब शांत हो तब उसको परिभाषित करना सबसे मुश्किल होता है क्योंकि विचलित मन के लांछनों को ढोने वाले शब्दों को पता होता हैं कि सुकून के पलों को उसकी इतनी ज़रूरत नहीं जितनी खामोशी की।


मन खामोश है लेकिन आज ये खामोशी गुनगुना रही है कायनाती गीत जो अलौकिक होते हुए भी जीवन के हर पल, और उसकी दी हुई हर चीज़ को भोगने के लिए आतुर है। यहां जीवन देह नहीं लेकिन देह एक ज़रिया है जीवन को प्रवाहमान बनाए रखने के लिए। आज देह की ज़रूरत है तो सिर्फ इसलिए कि मन के कायनाती गीत को शब्द मिल सके।


इस गीत के खामोश शब्द बोलना सिख रहे है वही बच्चों सी तुतलाती भाषा में, गली में आये झूले वाले की आवाज़ पर जैसे मां का पल्लू खिंच रहे है, फेरी वाले की घंटी पर मचलते हुए, घर की दहलीज़ पर आकर खडे है, आज उस कायनाती गीत को ज़रूरत है एक बच्चे के देह की जिससे वो जीवन के सबसे निर्मल, स्वच्छंद गीत को गा सके।


ये निर्मलता, ये स्वच्छंदता का गीत दहलीज़ पार कर यौवन के आंगन पर नंगे पांव चल पडता है जब उसे दिखाई देती है तपते रेगिस्तान की मरिचिका, एक असहनीय प्यास लिए भटकता है गीत, जानते हुए कि ये सिर्फ एक मरिचिका है जो उसे बहुत दूर तक ले जाएगी फिर भी खुद को वहीं खडा हुआ पाएगा, फिर भी भटकना नियति है ताकि उस भटकन को शब्द मिल सके आंगन पार की दुनिया को परिभाषित करने के लिए, यही तो वो समय है जब भावनाओं के पास पूरा शब्दकोश होता है फिर भी वो खुद को परिभाषित करने में विफल हो जाता है। यौवन का गीत जो पूरी तरह से लौकिक होता है लेकिन छोड जाता है एक अलौकिक अधूरापन जिसको पूरा करती है ये खामोशी............
अस्वीकरण