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31 अक्टूबर, 2007


ब्लॉग्स (2)
तुम सच के धरातल पर खड़े किसी महात्मा की मूरत की तरह जिसको लोग नमस्कार कर आगे बढ़ जाते हैं एक और झूठ बोलने के लिए, मैं कल्पना के आसमान में उड़ती अदनी-सी चिड़िया। तुम सच के विकृत रूप को निडरता से स्वीकार करने वाले रोशनी से भरपूर दिन मैं सपने के सच हो जाने के ... आगे पढ़ें...

शायद शब्द कम पड रहे है..... नहीं...... शायद हमेशा की तरह ही उसे शब्दों में ढालना मुश्किल हो रहा है, नहीं..... शायद विचलित मन की व्यथा को परिभाषित करने के लिए बहुत से शब्द होते है लेकिन मन जब शांत हो तब उसको परिभाषित करना सबसे मुश्किल होता है क्योंकि ... आगे पढ़ें...